Śiva Sūtras · Chapter 3

Śiva Sūtras — Chapter 3

शिवसूत्राणि

Śivasūtrāṇi


Chapter 3 45 verses

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  1. 1 ātmā cittam (व्यष्टि) आत्मा (ही यहाँ) चित्त (विषयों में लगा मन) है।
  2. 2 jñānaṃ bandhaḥ (ऐसा सीमित) ज्ञान बन्ध है।
  3. 3 kalādīnāṃ tattvānām aviveko māyā कला आदि तत्त्वों का अविवेक (न पहचानना) ही माया है।
  4. 4 śarīre saṃhāraḥ kalānām शरीर में (सूक्ष्म तथा स्थूल) कलाओं का संहार (विलय किया जाए)।
  5. 5 nāḍī-saṃhāra-bhūta-jaya-bhūta-kaivalya-bhūta-pṛthaktvāni नाडियों का संहार, भूतजय (तत्त्वों पर विजय), भूत-कैवल्य (तत्त्वों से पृथक्करण) और…
  6. 6 mohāvaraṇāt siddhiḥ मोह के आवरण से (अपूर्ण) सिद्धि (प्रतीत) होती है।
  7. 7 moha-jayād anantābhogāt sahaja-vidyā-jayaḥ मोह पर विजय और अनन्त आभोग (चेतना के अनन्त विस्तार) से सहज विद्या पर विजय (प्राप्त होती…
  8. 8 jāgrad dvitīya-karaḥ (योगी की) जाग्रत् अवस्था (उसकी अन्तर्ज्योति की) द्वितीय किरण (मात्र) है।
  9. 9 nartaka ātmā आत्मा (एक) नर्तक है।
  10. 10 raṅgo 'ntarātmā अन्तरात्मा (सूक्ष्म शरीर ही उसकी) रङ्ग-भूमि है।
  11. 11 prekṣakāṇīndriyāṇi इन्द्रियाँ (उसके नृत्य की) दर्शक हैं।
  12. 12 dhī-vaśāt sattva-siddhiḥ धी (प्रबुद्ध बुद्धि) के बल से सत्त्व (वास्तविक सत्ता) की सिद्धि होती है।
  13. 13 siddhaḥ svatantra-bhāvaḥ (इस प्रकार) स्वतन्त्र-भाव (पूर्ण स्वतन्त्रता की अवस्था) सिद्ध हो जाती है।
  14. 14 yathā tatra tathānyatra जैसा वहाँ (अपने शरीर में), वैसा ही अन्यत्र (किसी अन्य शरीर में भी)।
  15. 15 bījāvadhānam बीज (परम शक्ति, सर्व का उद्गम-स्रोत) पर (निरन्तर) अवधान (ध्यान) हो।
  16. 16 āsana-sthaḥ sukhaṃ hrade nimajjati आसन (शक्ति-रूप यथार्थ स्थान) में स्थित (योगी) सुखपूर्वक (परम चेतना के) ह्रद (सरोवर) में…
  17. 17 sva-mātrā-nirmāṇam āpādayati (वह) स्व-मात्रा के अनुसार (अपनी चेतना के अनुपात में) सृष्टि का निर्माण कर लेता है।
  18. 18 vidyāvināśe janma-vināśaḥ (शुद्ध) विद्या के अविनाश (अक्षयता) होने पर जन्म का विनाश हो जाता है।
  19. 19 kavargādiṣu māheśvaryādyāḥ paśu-mātaraḥ क-वर्ग आदि (वर्ण-वर्गों) में अधिष्ठित माहेश्वरी आदि (शक्तियाँ) पशु (बद्ध जीव) की मातृकाएँ…
  20. 20 triṣu caturthaṃ tailavad āsecyam तीनों (अवस्थाओं — जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) में चतुर्थ (तुर्य) को तेल की तरह आसिंचित…
  21. 21 magnaḥ sva-cittena praviśet (आत्म-तत्त्व में) निमग्न (योगी), अपने (शुद्ध) चित्त के द्वारा (हृदय में) प्रवेश करे।
  22. 22 prāṇa-samācāre sama-darśanam प्राण के समाचार (मन्द-समान गति) में सम-दर्शन (सब में समान दृष्टि) उत्पन्न होता है।
  23. 23 madhye 'vara-prasavaḥ मध्य (तुर्य और अन्य अवस्था के बीच की) अवस्था में अवर (निम्नतर अनुभव) का प्रसव (उत्पत्ति)…
  24. 24 mātrāsva-pratyaya-sandhāne naṣṭasya punar-utthānam मात्राओं (विषय-अनुभूतियों) के प्रत्ययों के साथ अनुसन्धान करने से नष्ट (तुर्य) का…
  25. 25 śiva-tulyo jāyate (ऐसा योगी) शिव-तुल्य (शिव के समान) हो जाता है।
  26. 26 śarīra-vṛttir vratam (केवल) शरीर का धारण-मात्र ही (उसका) व्रत है।
  27. 27 kathā japaḥ (उसकी सामान्य) बातचीत ही जप है।
  28. 28 dānam ātma-jñānam (उसका) दान आत्मज्ञान (ही) है।
  29. 29 yo 'vipastho jñā-hetuś ca जो (इन्द्रिय-समूह के) रक्षक के पद पर स्थित है, वही (उनके) ज्ञान का हेतु भी है।
  30. 30 sva-śakti-pracayo 'sya viśvam उसके लिए सम्पूर्ण विश्व अपनी ही शक्तियों का प्रचय (विस्तार) है।
  31. 31 sthiti-layau (इस विश्व की) स्थिति और लय (भी उसी के विस्तार हैं)।
  32. 32 tat-pravṛttāv apy anirāsaḥ saṃvettṛ-bhāvāt उस (सृष्टि-संहार) की प्रवृत्ति में भी (उसके स्वरूप का) कोई निरास (विलोप) नहीं होता,…
  33. 33 sukha-duḥkhayor bahir-mananam (उसके लिए) सुख-दुःख (दोनों) बाह्य (विषयों के समान) माने जाते हैं।
  34. 34 tad-vimuktas tu kevalī उससे (इस द्वैत से) विमुक्त (योगी) तो वस्तुतः केवली (पूर्णतः अकेला, असङ्ग) है।
  35. 35 moha-pratisaṃhatas tu karmātmā किन्तु मोह से प्रतिसंहत (आक्रान्त) कर्मात्मा (कर्म-बद्ध जीव) ही (रह जाता) है।
  36. 36 bheda-tiraskāre sargāntara-karmatvam भेद के तिरस्कार (अस्वीकार) पर अन्य सर्ग (नई सृष्टि) के कर्तृत्व का (सामर्थ्य उत्पन्न)…
  37. 37 karaṇa-śaktiḥ svato 'nubhavāt (योगी की) करण-शक्ति (सृजन की शक्ति) स्वयं के अनुभव से (जानी जाती है)।
  38. 38 tripadādy-anuprāṇanam त्रिपद (तीनों अवस्थाओं) आदि का अनुप्राणन (प्रथम — तुर्य के द्वारा सजीव होना) होता है।
  39. 39 citta-sthitivac charīra-karaṇa-bāhyeṣu जैसे चित्त की (एकाग्र) स्थिति में, वैसे ही शरीर, इन्द्रियों और बाह्य (विषयों) में भी…
  40. 40 abhilāṣād bahir-gatiḥ saṃvāhyasya अभिलाषा (कामना) से ही संवाह्य (संसार-चक्र में ढोए जाने वाले) जीव की बहिर्गति (बाह्य…
  41. 41 tad-ārūḍha-pramites tat-kṣayāj jīva-saṅkṣayaḥ तत् (आत्मतत्त्व) में आरूढ़ प्रमिति (बोध) वाले के लिए, उस (अभिलाषा) के क्षय से जीव-भाव का…
  42. 42 bhūta-kañcukī tadā vimukto bhūyaḥ pati-samaḥ paraḥ तब (वह) भूतों (पञ्च-तत्त्वों) को (केवल) कञ्चुक (बाह्य आवरण) के रूप में धारण करने वाला,…
  43. 43 naisargikaḥ prāṇa-sambandhaḥ प्राण के साथ (जीव का) सम्बन्ध नैसर्गिक (स्वाभाविक) है।
  44. 44 nāsikāntar-madhya-saṃyamāt kim atra savya-apasavya-sauṣumneṣu नासिका के भीतर के मध्य भाग (प्राण के केन्द्र) पर संयम से, यहाँ इडा, पिङ्गला और सुषुम्ना…
  45. 45 bhūyaḥ syāt pratimīlanam बार-बार प्रतिमीलन (दृष्टि का एक साथ भीतर आत्मा की ओर तथा बाहर जगत् को शिव-रूप में देखने…