शिवसूत्राणि
Śivasūtrāṇi
- 1 ātmā cittam (व्यष्टि) आत्मा (ही यहाँ) चित्त (विषयों में लगा मन) है।
- 2 jñānaṃ bandhaḥ (ऐसा सीमित) ज्ञान बन्ध है।
- 3 kalādīnāṃ tattvānām aviveko māyā कला आदि तत्त्वों का अविवेक (न पहचानना) ही माया है।
- 4 śarīre saṃhāraḥ kalānām शरीर में (सूक्ष्म तथा स्थूल) कलाओं का संहार (विलय किया जाए)।
- 5 nāḍī-saṃhāra-bhūta-jaya-bhūta-kaivalya-bhūta-pṛthaktvāni नाडियों का संहार, भूतजय (तत्त्वों पर विजय), भूत-कैवल्य (तत्त्वों से पृथक्करण) और…
- 6 mohāvaraṇāt siddhiḥ मोह के आवरण से (अपूर्ण) सिद्धि (प्रतीत) होती है।
- 7 moha-jayād anantābhogāt sahaja-vidyā-jayaḥ मोह पर विजय और अनन्त आभोग (चेतना के अनन्त विस्तार) से सहज विद्या पर विजय (प्राप्त होती…
- 8 jāgrad dvitīya-karaḥ (योगी की) जाग्रत् अवस्था (उसकी अन्तर्ज्योति की) द्वितीय किरण (मात्र) है।
- 9 nartaka ātmā आत्मा (एक) नर्तक है।
- 10 raṅgo 'ntarātmā अन्तरात्मा (सूक्ष्म शरीर ही उसकी) रङ्ग-भूमि है।
- 11 prekṣakāṇīndriyāṇi इन्द्रियाँ (उसके नृत्य की) दर्शक हैं।
- 12 dhī-vaśāt sattva-siddhiḥ धी (प्रबुद्ध बुद्धि) के बल से सत्त्व (वास्तविक सत्ता) की सिद्धि होती है।
- 13 siddhaḥ svatantra-bhāvaḥ (इस प्रकार) स्वतन्त्र-भाव (पूर्ण स्वतन्त्रता की अवस्था) सिद्ध हो जाती है।
- 14 yathā tatra tathānyatra जैसा वहाँ (अपने शरीर में), वैसा ही अन्यत्र (किसी अन्य शरीर में भी)।
- 15 bījāvadhānam बीज (परम शक्ति, सर्व का उद्गम-स्रोत) पर (निरन्तर) अवधान (ध्यान) हो।
- 16 āsana-sthaḥ sukhaṃ hrade nimajjati आसन (शक्ति-रूप यथार्थ स्थान) में स्थित (योगी) सुखपूर्वक (परम चेतना के) ह्रद (सरोवर) में…
- 17 sva-mātrā-nirmāṇam āpādayati (वह) स्व-मात्रा के अनुसार (अपनी चेतना के अनुपात में) सृष्टि का निर्माण कर लेता है।
- 18 vidyāvināśe janma-vināśaḥ (शुद्ध) विद्या के अविनाश (अक्षयता) होने पर जन्म का विनाश हो जाता है।
- 19 kavargādiṣu māheśvaryādyāḥ paśu-mātaraḥ क-वर्ग आदि (वर्ण-वर्गों) में अधिष्ठित माहेश्वरी आदि (शक्तियाँ) पशु (बद्ध जीव) की मातृकाएँ…
- 20 triṣu caturthaṃ tailavad āsecyam तीनों (अवस्थाओं — जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) में चतुर्थ (तुर्य) को तेल की तरह आसिंचित…
- 21 magnaḥ sva-cittena praviśet (आत्म-तत्त्व में) निमग्न (योगी), अपने (शुद्ध) चित्त के द्वारा (हृदय में) प्रवेश करे।
- 22 prāṇa-samācāre sama-darśanam प्राण के समाचार (मन्द-समान गति) में सम-दर्शन (सब में समान दृष्टि) उत्पन्न होता है।
- 23 madhye 'vara-prasavaḥ मध्य (तुर्य और अन्य अवस्था के बीच की) अवस्था में अवर (निम्नतर अनुभव) का प्रसव (उत्पत्ति)…
- 24 mātrāsva-pratyaya-sandhāne naṣṭasya punar-utthānam मात्राओं (विषय-अनुभूतियों) के प्रत्ययों के साथ अनुसन्धान करने से नष्ट (तुर्य) का…
- 25 śiva-tulyo jāyate (ऐसा योगी) शिव-तुल्य (शिव के समान) हो जाता है।
- 26 śarīra-vṛttir vratam (केवल) शरीर का धारण-मात्र ही (उसका) व्रत है।
- 27 kathā japaḥ (उसकी सामान्य) बातचीत ही जप है।
- 28 dānam ātma-jñānam (उसका) दान आत्मज्ञान (ही) है।
- 29 yo 'vipastho jñā-hetuś ca जो (इन्द्रिय-समूह के) रक्षक के पद पर स्थित है, वही (उनके) ज्ञान का हेतु भी है।
- 30 sva-śakti-pracayo 'sya viśvam उसके लिए सम्पूर्ण विश्व अपनी ही शक्तियों का प्रचय (विस्तार) है।
- 31 sthiti-layau (इस विश्व की) स्थिति और लय (भी उसी के विस्तार हैं)।
- 32 tat-pravṛttāv apy anirāsaḥ saṃvettṛ-bhāvāt उस (सृष्टि-संहार) की प्रवृत्ति में भी (उसके स्वरूप का) कोई निरास (विलोप) नहीं होता,…
- 33 sukha-duḥkhayor bahir-mananam (उसके लिए) सुख-दुःख (दोनों) बाह्य (विषयों के समान) माने जाते हैं।
- 34 tad-vimuktas tu kevalī उससे (इस द्वैत से) विमुक्त (योगी) तो वस्तुतः केवली (पूर्णतः अकेला, असङ्ग) है।
- 35 moha-pratisaṃhatas tu karmātmā किन्तु मोह से प्रतिसंहत (आक्रान्त) कर्मात्मा (कर्म-बद्ध जीव) ही (रह जाता) है।
- 36 bheda-tiraskāre sargāntara-karmatvam भेद के तिरस्कार (अस्वीकार) पर अन्य सर्ग (नई सृष्टि) के कर्तृत्व का (सामर्थ्य उत्पन्न)…
- 37 karaṇa-śaktiḥ svato 'nubhavāt (योगी की) करण-शक्ति (सृजन की शक्ति) स्वयं के अनुभव से (जानी जाती है)।
- 38 tripadādy-anuprāṇanam त्रिपद (तीनों अवस्थाओं) आदि का अनुप्राणन (प्रथम — तुर्य के द्वारा सजीव होना) होता है।
- 39 citta-sthitivac charīra-karaṇa-bāhyeṣu जैसे चित्त की (एकाग्र) स्थिति में, वैसे ही शरीर, इन्द्रियों और बाह्य (विषयों) में भी…
- 40 abhilāṣād bahir-gatiḥ saṃvāhyasya अभिलाषा (कामना) से ही संवाह्य (संसार-चक्र में ढोए जाने वाले) जीव की बहिर्गति (बाह्य…
- 41 tad-ārūḍha-pramites tat-kṣayāj jīva-saṅkṣayaḥ तत् (आत्मतत्त्व) में आरूढ़ प्रमिति (बोध) वाले के लिए, उस (अभिलाषा) के क्षय से जीव-भाव का…
- 42 bhūta-kañcukī tadā vimukto bhūyaḥ pati-samaḥ paraḥ तब (वह) भूतों (पञ्च-तत्त्वों) को (केवल) कञ्चुक (बाह्य आवरण) के रूप में धारण करने वाला,…
- 43 naisargikaḥ prāṇa-sambandhaḥ प्राण के साथ (जीव का) सम्बन्ध नैसर्गिक (स्वाभाविक) है।
- 44 nāsikāntar-madhya-saṃyamāt kim atra savya-apasavya-sauṣumneṣu नासिका के भीतर के मध्य भाग (प्राण के केन्द्र) पर संयम से, यहाँ इडा, पिङ्गला और सुषुम्ना…
- 45 bhūyaḥ syāt pratimīlanam बार-बार प्रतिमीलन (दृष्टि का एक साथ भीतर आत्मा की ओर तथा बाहर जगत् को शिव-रूप में देखने…