चित्तस्थितिवच्छरीरकरणबाह्येषु ॥३९॥
citta-sthitivac charīra-karaṇa-bāhyeṣu
sūtra
जैसे चित्त की (एकाग्र) स्थिति में, वैसे ही शरीर, इन्द्रियों और बाह्य (विषयों) में भी (तुर्य व्याप्त रहता है)।
जैसे चित्त की (एकाग्र) स्थिति में, वैसे ही शरीर, इन्द्रियों और बाह्य (विषयों) में भी (तुर्य व्याप्त रहता है)।