Śiva Sūtras · 3.39

Śiva Sūtras 3.39

3.39
चित्तस्थितिवच्छरीरकरणबाह्येषु ॥३९॥
citta-sthitivac charīra-karaṇa-bāhyeṣu
sūtra
— चित्त-स्थिति-वत् — (एकाग्र) चित्त की स्थिति की तरह (अव्यय, उपमासूचक) ; — शरीर-करण-बाह्य में — शरीर, इन्द्रियों और बाह्य (विषयों) में (नपुं. बहुवचन, अधिकरण कारक, द्वन्द्व समास)

जैसे चित्त की (एकाग्र) स्थिति में, वैसे ही शरीर, इन्द्रियों और बाह्य (विषयों) में भी (तुर्य व्याप्त रहता है)।