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Śiva Sūtras· 3.38 / 45

Śiva Sūtras3.38

3.38
त्रिपदाद्यनुप्राणनम् ॥३८॥
tripadādy-anuprāṇanam
sūtra
— त्रिपद-आदि-अनुप्राणन — तीनों अवस्थाओं (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) तथा आगे की (अवस्थाओं) का आदि (तुर्य) के द्वारा अनुप्राणन (सजीव होना) (नपुं. एकवचन, तत्पुरुष समास)

त्रिपद (तीनों अवस्थाओं) आदि का अनुप्राणन (प्रथम — तुर्य के द्वारा सजीव होना) होता है।