Śiva Sūtras · 3.40

Śiva Sūtras 3.40

3.40
अभिलाषाद्बहिर्गतिः संवाह्यस्य ॥४०॥
abhilāṣād bahir-gatiḥ saṃvāhyasya
sūtra
— अभिलाषा से — कामना/अभिलाषा से (पुं. एकवचन, अपादान) ; — बहिर्-गति — बाहर की ओर गति (स्त्री. एकवचन, तत्पुरुष समास) ; — संवाह्य की — (संसार के द्वारा) ले जाए जाने वाले मोहित जीव की (पुं. एकवचन, सम्बन्ध कारक, भविष्यत्कालिक कर्मवाच्य कृदन्त)

अभिलाषा (कामना) से ही संवाह्य (संसार-चक्र में ढोए जाने वाले) जीव की बहिर्गति (बाह्य प्रवृत्ति) होती है।