अभिलाषाद्बहिर्गतिः संवाह्यस्य ॥४०॥
abhilāṣād bahir-gatiḥ saṃvāhyasya
sūtra
अभिलाषा (कामना) से ही संवाह्य (संसार-चक्र में ढोए जाने वाले) जीव की बहिर्गति (बाह्य प्रवृत्ति) होती है।
अभिलाषा (कामना) से ही संवाह्य (संसार-चक्र में ढोए जाने वाले) जीव की बहिर्गति (बाह्य प्रवृत्ति) होती है।