Śiva Sūtras · 3.41

Śiva Sūtras 3.41

3.41
तदारूढप्रमितेस्तत्क्षयाज्जीवसङ्क्षयः ॥४१॥
tad-ārūḍha-pramites tat-kṣayāj jīva-saṅkṣayaḥ
sūtra
— तत्-आरूढ-प्रमिति का — उस (आत्मतत्त्व) में आरूढ़ बोध वाले (योगी) का (पुं. एकवचन, सम्बन्ध कारक, बहुव्रीहि) ; — तत्-क्षय से — उस (अभिलाषा) के क्षय से (पुं. एकवचन, अपादान, तत्पुरुष समास) ; — जीव-संक्षय — (सीमित) जीव-भाव का विनाश (पुं. एकवचन, तत्पुरुष समास)

तत् (आत्मतत्त्व) में आरूढ़ प्रमिति (बोध) वाले के लिए, उस (अभिलाषा) के क्षय से जीव-भाव का संक्षय (विनाश) होता है।