Śiva Sūtras · 3.42

Śiva Sūtras 3.42

3.42
भूतकञ्चुकी तदा विमुक्तो भूयः पतिसमः परः ॥४२॥
bhūta-kañcukī tadā vimukto bhūyaḥ pati-samaḥ paraḥ
sūtra
— भूत-कञ्चुकी — (पञ्च-)भूतों को (केवल) कञ्चुक/बाह्य आवरण के रूप में धारण करने वाला (पुं. एकवचन, बहुव्रीहि) ; — तदा — तब (अव्यय) ; — विमुक्त — मुक्त (पुं. एकवचन, भूत कृदन्त) ; — भूयः — तत्पश्चात्, पुनः (अव्यय) ; — पति-सम — परम शिव (पति) के समान (पुं. एकवचन, तत्पुरुष समास) ; — परः — परम, सर्वोच्च (पुं. एकवचन)

तब (वह) भूतों (पञ्च-तत्त्वों) को (केवल) कञ्चुक (बाह्य आवरण) के रूप में धारण करने वाला, विमुक्त, और तत्पश्चात् पति-सम (परम शिव के समान) परम (हो जाता) है।