Śiva Sūtras · 3.20

Śiva Sūtras 3.20

3.20
त्रिषु चतुर्थं तैलवदासेच्यम् ॥२०॥
triṣu caturthaṃ tailavad āsecyam
sūtra
— त्रिषु — तीनों (जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति अवस्थाओं) में (पुं. बहुवचन, अधिकरण कारक) ; — चतुर्थ — चौथा (तुर्य) (नपुं. एकवचन, क्रमवाचक संख्या) ; — तैलवत् — तेल की तरह (अव्यय, उपमासूचक) ; — आसेच्य — सिञ्चित/भरा जाना चाहिए (नपुं. एकवचन, भविष्यत्कालिक कर्मवाच्य कृदन्त)

तीनों (अवस्थाओं — जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति) में चतुर्थ (तुर्य) को तेल की तरह आसिंचित (व्याप्त) किया जाए।