Śiva Sūtras · 3.16

Śiva Sūtras 3.16

3.16
आसनस्थः सुखं ह्रदे निमज्जति ॥१६॥
āsana-sthaḥ sukhaṃ hrade nimajjati
sūtra
— आसन-स्थ — आसन (शक्ति-रूप यथार्थ स्थान) में स्थित (पुं. एकवचन, तत्पुरुष समास) ; — सुखम् — सुखपूर्वक, आनन्द से (नपुं. एकवचन, क्रिया-विशेषण) ; — ह्रद में — (परम चेतना के) सरोवर में (पुं. एकवचन, अधिकरण कारक) ; — निमज्जति — निमग्न होता है, डूब जाता है (वर्तमान काल, प्रथम पुरुष, एकवचन)

आसन (शक्ति-रूप यथार्थ स्थान) में स्थित (योगी) सुखपूर्वक (परम चेतना के) ह्रद (सरोवर) में निमग्न हो जाता है।