Śiva Sūtras · 3.29

Śiva Sūtras 3.29

3.29
योऽविपस्थो ज्ञाहेतुश्च ॥२९॥
yo 'vipastho jñā-hetuś ca
sūtra
— यः — जो (पुं. एकवचन, सम्बन्धवाचक सर्वनाम) ; — अविप-स्थ — (इन्द्रिय-)झुण्ड के रक्षक के पद पर स्थित (पुं. एकवचन, तत्पुरुष समास) ; — ज्ञा-हेतु — (आत्म-)ज्ञान का कारण (पुं. एकवचन, तत्पुरुष समास) ; — च — और (अव्यय)

जो (इन्द्रिय-समूह के) रक्षक के पद पर स्थित है, वही (उनके) ज्ञान का हेतु भी है।