तत्प्रवृत्तावप्यनिरासः संवेत्तृभावात् ॥३२॥
tat-pravṛttāv apy anirāsaḥ saṃvettṛ-bhāvāt
sūtra
उस (सृष्टि-संहार) की प्रवृत्ति में भी (उसके स्वरूप का) कोई निरास (विलोप) नहीं होता, क्योंकि वह (शुद्ध) संवेत्ता (ज्ञाता) ही बना रहता है।
उस (सृष्टि-संहार) की प्रवृत्ति में भी (उसके स्वरूप का) कोई निरास (विलोप) नहीं होता, क्योंकि वह (शुद्ध) संवेत्ता (ज्ञाता) ही बना रहता है।