Śiva Sūtras · 3.32

Śiva Sūtras 3.32

3.32
तत्प्रवृत्तावप्यनिरासः संवेत्तृभावात् ॥३२॥
tat-pravṛttāv apy anirāsaḥ saṃvettṛ-bhāvāt
sūtra
— तत्-प्रवृत्ति में — उस (सृष्टि/संहार) की प्रवृत्ति होने पर भी (स्त्री. एकवचन, अधिकरण कारक, तत्पुरुष समास) ; — अपि — भी (अव्यय) ; — अनिरास — (स्वरूप का) कोई विलोप/अपवर्जन नहीं (पुं. एकवचन) ; — संवेत्तृ-भाव से — (शुद्ध) ज्ञाता-भाव के कारण (पुं. एकवचन, अपादान, तत्पुरुष समास)

उस (सृष्टि-संहार) की प्रवृत्ति में भी (उसके स्वरूप का) कोई निरास (विलोप) नहीं होता, क्योंकि वह (शुद्ध) संवेत्ता (ज्ञाता) ही बना रहता है।