Śiva Sūtras · 3.44

Śiva Sūtras 3.44

3.44
नासिकान्तर्मध्यसंयमात् किमत्र सव्यापसव्यसौषुम्नेषु ॥४४॥
nāsikāntar-madhya-saṃyamāt kim atra savya-apasavya-sauṣumneṣu
sūtra
— नासिका-अन्तर्-मध्य-संयम से — नासिका के भीतर के मध्य भाग (श्वास के केन्द्र) पर संयम से (पुं. एकवचन, अपादान, तत्पुरुष समास) ; — किम् अत्र — यहाँ क्या (आवश्यकता) है (अव्यय वाक्यांश) ; — सव्य-अपसव्य-सौषुम्न में — इडा, पिङ्गला और सुषुम्ना नाडियों पर (विचार करने की) (पुं. बहुवचन, अधिकरण कारक, द्वन्द्व समास)

नासिका के भीतर के मध्य भाग (प्राण के केन्द्र) पर संयम से, यहाँ इडा, पिङ्गला और सुषुम्ना (नाडियों) पर (विचार करने की) क्या आवश्यकता है?