शिवसूत्राणि
Śivasūtrāṇi
- 1 cittaṃ mantraḥ (परम तत्त्व में लीन) चित्त ही मन्त्र है।
- 2 prayatnaḥ sādhakaḥ (आत्मा की ओर सहज) प्रयत्न ही (सच्चा) साधक है।
- 3 vidyā-śarīra-sattā mantra-rahasyam जिसका शरीर (शुद्ध) विद्या है — उसी की सत्ता मन्त्र का रहस्य है।
- 4 garbhe citta-vikāso 'viśiṣṭa-vidyā-svapnaḥ माया के गर्भ में चित्त का विकास (विस्तार) केवल अविशिष्ट (अपरिष्कृत) विद्या का स्वप्न…
- 5 vidyā-samutthāne svābhāvike khecarī śivāvasthā (शुद्ध) विद्या के स्वाभाविक (सहज) समुत्थान होने पर खेचरी (शुद्ध चेतना के आकाश में संचार)…
- 6 gurur upāyaḥ गुरु ही उपाय (साधन) है।
- 7 mātṛkā-cakra-sambodhaḥ (गुरु से) मातृका-चक्र (वर्ण-मातृकाओं के समूह) का सम्बोध (पूर्ण ज्ञान) होता है।
- 8 śarīraṃ haviḥ (ऐसे योगी के लिए) शरीर ही हवि (आहुति) है।
- 9 jñānam annam (सीमित) ज्ञान (उसका) अन्न (आहार) है।
- 10 vidyā-saṃhāre tadutthа-svapna-darśanam (शुद्ध) विद्या के संहार (तिरोधान) पर उससे उत्पन्न स्वप्न का दर्शन होता है।