Śiva Sūtras · 2.4

Śiva Sūtras 2.4

2.4
गर्भे चित्तविकासोऽविशिष्टविद्यास्वप्नः ॥४॥
garbhe citta-vikāso 'viśiṣṭa-vidyā-svapnaḥ
sūtra
— गर्भ में — (माया के) गर्भ में (पुं. एकवचन, अधिकरण कारक) ; — चित्त-विकास — चित्त का (निम्न आनन्द में) विकास/विस्तार (पुं. एकवचन, तत्पुरुष समास) ; — अविशिष्ट-विद्या-स्वप्न — अविशिष्ट (अपरिष्कृत) ज्ञान का स्वप्न (पुं. एकवचन, तत्पुरुष समास)

माया के गर्भ में चित्त का विकास (विस्तार) केवल अविशिष्ट (अपरिष्कृत) विद्या का स्वप्न (मात्र) है।