Śiva Sūtras · Chapter 1

Śiva Sūtras — Chapter 1

शिवसूत्राणि

Śivasūtrāṇi


Chapter 1 22 verses

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  1. 1 caitanyam ātmā चैतन्य (शुद्ध चेतना) ही आत्मा है।
  2. 2 jñānaṃ bandhaḥ (सीमित, द्वैतपूर्ण) ज्ञान ही बन्ध है।
  3. 3 yonivargaḥ kalāśarīram योनिवर्ग (माया — प्रपञ्च का उद्गम-समूह) तथा कलाओं से बना शरीर (भी बन्ध हैं)।
  4. 4 jñānādhiṣṭhānaṃ mātṛkā (बद्ध) ज्ञान का अधिष्ठान (आधार) मातृका (अज्ञात वर्ण-मातृकाओं का समूह) है।
  5. 5 udyamo bhairavaḥ उद्यम (शुद्ध चेतना का सहसा उन्मेष) ही भैरव (परम शिव) है।
  6. 6 śakticakra-sandhāne viśva-saṃhāraḥ शक्ति-चक्र के साथ अनुसन्धान (मिलन) होने पर विश्व का (पृथक्-रूप से) संहार हो जाता है।
  7. 7 jāgrat-svapna-suṣupta-bhede turyābhoga-sambhavaḥ (योगी के लिए) जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के भेद में भी तुर्या (चतुर्थ अवस्था) के आभोग…
  8. 8 jñānaṃ jāgrat (लौकिक) ज्ञान ही जाग्रत् अवस्था है।
  9. 9 svapno vikalpāḥ स्वप्न (अवस्था) विकल्पों (मानसिक संकल्पों) का रूप है।
  10. 10 aviveko māyāsauṣuptam अविवेक (विवेक का अभाव) ही माया-सौषुप्त (माया-जनित सुषुप्ति) है।
  11. 11 tritaya-bhoktā vīreśaḥ तीनों (अवस्थाओं) का भोक्ता (ही) वीरेश (इन्द्रिय-वीरों का स्वामी) है।
  12. 12 vismayo yoga-bhūmikāḥ विस्मय (अद्भुत-भाव) ही योग की भूमिकाएँ (अवस्थाएँ) हैं।
  13. 13 icchāśaktir umā kumārī इच्छाशक्ति (ही) उमा है, कुमारी है (शुद्ध, अव्यभिचारी संकल्प-शक्ति)।
  14. 14 dṛśyaṃ śarīram सम्पूर्ण दृश्य (प्रपञ्च ही उसका) शरीर है।
  15. 15 hṛdaye citta-saṅghaṭṭād dṛśya-svāpa-darśanam हृदय में चित्त के सङ्घट्ट (एकाग्र मिलन) से दृश्य के स्वाप (विलयन) का दर्शन होता है।
  16. 16 śuddha-tattva-sandhānād vā apaśu-śaktiḥ अथवा शुद्ध तत्त्व (शिव-तत्त्व) के साथ अनुसन्धान से अपशु-शक्ति (पाश-मुक्ति की शक्ति)…
  17. 17 vitarka ātmajñānam वितर्क (दृढ़ प्रत्यभिज्ञान) ही आत्मज्ञान है।
  18. 18 lokānandaḥ samādhi-sukham लोकानन्द (जगत् को देखने का आनन्द) ही समाधि का सुख है।
  19. 19 śakti-sandhāne śarīrotpattiḥ शक्ति के साथ अनुसन्धान से (इच्छित) शरीर की उत्पत्ति (सम्भव) है।
  20. 20 bhūta-sandhāna-bhūta-pṛthaktva-viśva-saṅghaṭṭāḥ (उसे) भूतों के सन्धान (मिलन), भूतों के पृथक्करण और विश्व के साथ सङ्घट्ट (एकीकरण) की…
  21. 21 śuddha-vidyodayāc cakreśatva-siddhiḥ शुद्धविद्या के उदय से शक्ति-चक्र पर ईशत्व (अधिपत्य) की सिद्धि होती है।
  22. 22 mahāhradānusandhānān mantra-vīryānubhavaḥ महाह्रद (परम चेतना के महान् सरोवर) के साथ अनुसन्धान से मन्त्र-वीर्य (मन्त्र की शक्ति) का…