1.17 वितर्क आत्मज्ञानम् ॥१७॥ vitarka ātmajñānam sūtra vitarkaḥ — वितर्क — दृढ़ प्रत्यभिज्ञान-बोध, आत्म-प्रतीति (पुं. एकवचन) ; ātma-jñānam — आत्म-ज्ञान — आत्मा का ज्ञान (नपुं. एकवचन, तत्पुरुष समास) वितर्क (दृढ़ प्रत्यभिज्ञान) ही आत्मज्ञान है।