Śiva Sūtras · 3.8

Śiva Sūtras 3.8

3.8
जाग्रद्द्वितीयकरः ॥८॥
jāgrad dvitīya-karaḥ
sūtra
— जाग्रत् — (योगी की) जाग्रत् अवस्था (नपुं. एकवचन, वर्तमान कृदन्त) ; — द्वितीय-कर — द्वितीय किरण (विषयों को प्रकाशित करने वाली) (पुं. एकवचन, तत्पुरुष समास)

(योगी की) जाग्रत् अवस्था (उसकी अन्तर्ज्योति की) द्वितीय किरण (मात्र) है।