Verses on the Recognition of the Lord · Chapter 4

Verses on the Recognition of the Lord — Chapter 4

ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका

Īśvarapratyabhijñākārikā


Chapter 4 8 verses

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  1. 1 sa hi pūrvānubhūtārtho-palabdhā parato 'pi san vimṛśan sa … क्योंकि वही (ईश्वर), पूर्व में अनुभूत अर्थ का उपलब्धा (ज्ञाता), बाद में भी वही रहता हुआ,…
  2. 2 bhāsayec ca svakāle 'rthāt pūrvābhāsitam āmṛśan svalakṣaṇaṃ ghaṭābhāsamātreṇāthākhilātmanā और अपने ही (वर्तमान) काल में पूर्व में प्रकाशित अर्थ का विमर्श करता हुआ वह (ईश्वर)…
  3. 3 na ca yuktaṃ smṛter bhede smaryamāṇasya bhāsanam tenaikyaṃ … और यदि स्मरण करने वाला (मूल अनुभव से) भिन्न हो, तो स्मर्यमाण वस्तु का प्रकाशन सम्भव नहीं;
  4. 4 naiva hy anubhavo bhāti smṛtau pūrvo 'rthavat pṛthak … क्योंकि स्मृति में पूर्व अनुभव अर्थ के समान पृथक् रूप में प्रतिभासित नहीं होता;
  5. 5 yoginām api bhāsante na dṛśo darśanāntare svasaṃvidekamānās tā … योगियों के लिए भी ज्ञान (दृक्) किसी अन्य ज्ञान के भीतर प्रतिभासित नहीं होते;
  6. 6 smaryate yad dṛg āsīn me saivam ity api … जब यह स्मरण किया जाता है कि 'मेरा एक ज्ञान था, और वह ऐसा था' — यद्यपि (वह) भेद-रूप में…
  7. 7 yā ca paśyāmy aham imaṃ ghaṭo 'yam iti … और 'मैं इसे देखता हूँ' अथवा 'यह घट है' इस रूप का जो निश्चयात्मक ज्ञान (अवसा) है, वह भी…
  8. 8 tan mayā dṛśyate dṛṣṭo 'yaṃ sa ity āmṛśaty … इस प्रकार वह (प्रमाता) 'यह मेरे द्वारा देखा जा रहा है' और 'यह वही है जो (पहले) देखा था' —…