Verses on the Recognition of the Lord· 4.5 / 8

Verses on the Recognition of the Lord4.5

4.5
योगिनाम् अपि भासन्ते न दृशो दर्शनान्तरे स्वसंविदेकमानास् ता भान्ति मेयपदे ऽपि वा ॥५॥
yoginām api bhāsante na dṛśo darśanāntare svasaṃvidekamānās tā bhānti meyapade 'pi vā
— योगियों के लिए (भी) ; — भी ; — प्रतिभासित होते हैं (√भास्, आत्मनेपद) ; — नहीं ; — दृशः — ज्ञान (देखने की क्रियाएँ) ; — अन्य ज्ञान में ; — अपनी ही संवित् से एकमात्र मेय (ज्ञेय) ; — वे (ज्ञान) ; — प्रकाशित होते हैं (√भा) ; — मेय-पद (ज्ञेय की स्थिति) में ; — अथवा (यदि किसी प्रकार)

योगियों के लिए भी ज्ञान (दृक्) किसी अन्य ज्ञान के भीतर प्रतिभासित नहीं होते; अपनी ही संवित् से एकमात्र ज्ञेय होते हुए वे प्रकाशित होते हैं — यदि ज्ञेय-पद में भी (प्रतिभासित होते हैं) तो इसी प्रकार (अपने ही प्रकाश से)।