योगिनाम् अपि भासन्ते न दृशो दर्शनान्तरे
स्वसंविदेकमानास् ता भान्ति मेयपदे ऽपि वा ॥५॥
yoginām api bhāsante na dṛśo darśanāntare
svasaṃvidekamānās tā bhānti meyapade 'pi vā
— योगियों के लिए (भी); — भी; — प्रतिभासित होते हैं (√भास्, आत्मनेपद); — नहीं; — दृशः — ज्ञान (देखने की क्रियाएँ); — अन्य ज्ञान में; — अपनी ही संवित् से एकमात्र मेय (ज्ञेय); — वे (ज्ञान); — प्रकाशित होते हैं (√भा); — मेय-पद (ज्ञेय की स्थिति) में; — अथवा (यदि किसी प्रकार)
योगियों के लिए भी ज्ञान (दृक्) किसी अन्य ज्ञान के भीतर प्रतिभासित नहीं होते; अपनी ही संवित् से एकमात्र ज्ञेय होते हुए वे प्रकाशित होते हैं — यदि ज्ञेय-पद में भी (प्रतिभासित होते हैं) तो इसी प्रकार (अपने ही प्रकाश से)।