न च युक्तं स्मृतेर् भेदे स्मर्यमाणस्य भासनम्
तेनैक्यं भिन्नकालानां संविदां वेदितैष सः ॥३॥
na ca yuktaṃ smṛter bhede smaryamāṇasya bhāsanam
tenaikyaṃ bhinnakālānāṃ saṃvidāṃ veditaiṣa saḥ
— नहीं; — और; — युक्त, सम्भव; — स्मृति का (कर्ता का); — (प्रमाता के) भिन्न होने पर; — स्मर्यमाण (स्मरण किए जाने वाले) का; — प्रकाशन (भासन); — इसलिए; — ऐक्य, एकता; — भिन्न कालों की (संविदों) की; — संविदों (ज्ञानों) की; — वेदिता — ज्ञाता; — वह यही (ईश्वर है)
और यदि स्मरण करने वाला (मूल अनुभव से) भिन्न हो, तो स्मर्यमाण वस्तु का प्रकाशन सम्भव नहीं; इसलिए भिन्न कालों की संविदों (ज्ञानों) में एकता है — और इन सबका जो ज्ञाता है, वह यही (ईश्वर) है।