Verses on the Recognition of the Lord· 4.3 / 8

Verses on the Recognition of the Lord4.3

4.3
न च युक्तं स्मृतेर् भेदे स्मर्यमाणस्य भासनम् तेनैक्यं भिन्नकालानां संविदां वेदितैष सः ॥३॥
na ca yuktaṃ smṛter bhede smaryamāṇasya bhāsanam tenaikyaṃ bhinnakālānāṃ saṃvidāṃ veditaiṣa saḥ
— नहीं ; — और ; — युक्त, सम्भव ; — स्मृति का (कर्ता का) ; — (प्रमाता के) भिन्न होने पर ; — स्मर्यमाण (स्मरण किए जाने वाले) का ; — प्रकाशन (भासन) ; — इसलिए ; — ऐक्य, एकता ; — भिन्न कालों की (संविदों) की ; — संविदों (ज्ञानों) की ; — वेदिता — ज्ञाता ; — वह यही (ईश्वर है)

और यदि स्मरण करने वाला (मूल अनुभव से) भिन्न हो, तो स्मर्यमाण वस्तु का प्रकाशन सम्भव नहीं; इसलिए भिन्न कालों की संविदों (ज्ञानों) में एकता है — और इन सबका जो ज्ञाता है, वह यही (ईश्वर) है।