भासयेच् च स्वकाले ऽर्थात् पूर्वाभासितम् आमृशन्
स्वलक्षणं घटाभासमात्रेणाथाखिलात्मना ॥२॥
bhāsayec ca svakāle 'rthāt pūrvābhāsitam āmṛśan
svalakṣaṇaṃ ghaṭābhāsamātreṇāthākhilātmanā
— प्रकाशित करे (विधि, प्रेरणार्थक, √भास्); — और; — अपने (वर्तमान) काल में; — अनिवार्यतः, अर्थतः (पंचमी); — पूर्व में प्रकाशित (वस्तु को); — विमर्श करता हुआ (√मृश्+आ); — स्वलक्षण (विशेष वस्तु को); — केवल 'घट' इस आभास-मात्र से; — अथवा; — सम्पूर्ण स्वरूप से, समग्र रूप में
और अपने ही (वर्तमान) काल में पूर्व में प्रकाशित अर्थ का विमर्श करता हुआ वह (ईश्वर) अनिवार्यतः उस स्वलक्षण को प्रकाशित करता है — चाहे केवल 'घट' इस आभास-मात्र रूप में, अथवा उसके सम्पूर्ण स्वरूप में।