स हि पूर्वानुभूतार्थोपलब्धा परतो ऽपि सन्
विमृशन् स इति स्वैरी स्मरतीत्य् अपदिश्यते ॥१॥
sa hi pūrvānubhūtārtho-palabdhā parato 'pi san
vimṛśan sa iti svairī smaratīty apadiśyate
— वह (ईश्वर, ज्ञाता); — निश्चय ही, क्योंकि; — पूर्व में अनुभूत अर्थ का उपलब्धा (ज्ञाता); — बाद में, पश्चात्; — भी; — होता हुआ (√अस्, वर्तमान कृदन्त); — विमर्श करता हुआ (√मृश्+वि); — 'वह यही है' (इस रूप में); — इति — इस प्रकार; — स्वैरी — स्वच्छन्द, स्वतन्त्र; — स्मरण करता है (√स्मृ); — इति — इस प्रकार; — अपदिश्यते — कहा जाता है, अभिहित होता है (कर्मवाच्य)
क्योंकि वही (ईश्वर), पूर्व में अनुभूत अर्थ का उपलब्धा (ज्ञाता), बाद में भी वही रहता हुआ, 'वह यही है' इस प्रकार विमर्श करता हुआ, स्वतन्त्र रूप से स्मरण करता है — और इसी को 'स्मरण' कहा जाता है।