न चेद् अन्तःकृतानन्तविश्वरूपो महेश्वरः
स्याद् एकश् चिद्वपुर् ज्ञानस्मृत्यपोहनशक्तिमान् ॥७॥
na ced antaḥkṛtānantaviśvarūpo maheśvaraḥ
syād ekaś cidvapur jñānasmṛtyapohanaśaktimān
— नहीं (ऐसा होता); — यदि (न होता); — जिसने अनन्त विश्व को अपने भीतर समाहित कर लिया है; — महेश्वर; — होता (विधि, √अस्); — एक (अद्वितीय); — चित्-वपु — जिसका शरीर चैतन्य है; — ज्ञान, स्मृति और अपोहन (भेद-करण) की शक्ति वाला
— और ऐसा (नष्ट) हो ही जाता, यदि वह एक महेश्वर न होता, जिसने अनन्त विश्व को अपने भीतर समाहित कर लिया है, जो चित्-स्वरूप है, तथा जो ज्ञान, स्मृति और अपोहन (भेद-करण) की शक्ति से सम्पन्न है।