Verses on the Recognition of the Lord· 3.7 / 7

Verses on the Recognition of the Lord3.7

3.7
न चेद् अन्तःकृतानन्तविश्वरूपो महेश्वरः स्याद् एकश् चिद्वपुर् ज्ञानस्मृत्यपोहनशक्तिमान् ॥७॥
na ced antaḥkṛtānantaviśvarūpo maheśvaraḥ syād ekaś cidvapur jñānasmṛtyapohanaśaktimān
— नहीं (ऐसा होता) ; — यदि (न होता) ; — जिसने अनन्त विश्व को अपने भीतर समाहित कर लिया है ; — महेश्वर ; — होता (विधि, √अस्) ; — एक (अद्वितीय) ; — चित्-वपु — जिसका शरीर चैतन्य है ; — ज्ञान, स्मृति और अपोहन (भेद-करण) की शक्ति वाला

— और ऐसा (नष्ट) हो ही जाता, यदि वह एक महेश्वर न होता, जिसने अनन्त विश्व को अपने भीतर समाहित कर लिया है, जो चित्-स्वरूप है, तथा जो ज्ञान, स्मृति और अपोहन (भेद-करण) की शक्ति से सम्पन्न है।