Verses on the Recognition of the Lord· 4.7 / 8

Verses on the Recognition of the Lord4.7

4.7
या च पश्याम्य् अहम् इमं घटो ऽयम् इति वावसा मन्यते समवेतं साप्य् अवसातरि दर्शनम् ॥७॥
yā ca paśyāmy aham imaṃ ghaṭo 'yam iti vāvasā manyate samavetaṃ sāpy avasātari darśanam
— जो (निश्चयात्मक ज्ञान) ; — और ; — 'मैं इसे देखता हूँ' (√पश्) ; — 'यह घट है' ; — इति — इस रूप में ; — अथवा ; — अवसा — अवसाय, निश्चयात्मक ज्ञान ; — मानी जाती है (√मन्, आत्मनेपद) ; — समवेत (प्रमाता में अन्तर्भूत) ; — वह (अवसा) ; — भी ; — अवसाय करने वाले (प्रमाता) में ; — दर्शन — एक प्रकार का ज्ञान

और 'मैं इसे देखता हूँ' अथवा 'यह घट है' इस रूप का जो निश्चयात्मक ज्ञान (अवसा) है, वह भी अवसा करने वाले (प्रमाता) में समवेत एक ज्ञान (दर्शन) के रूप में माना जाता है।