The Essence of the Tantra· 8.39 / 93

The Essence of the Tantra8.39

8.39

मायागर्भाधिकारिणस् तु कस्यचिद् ईश्वरस्य प्रसादात् सर्वकर्मक्षये मायापुरुषविवेको भवति येन मायोर्ध्वे विज्ञानाकल आस्ते न जातुचित् मायाधः कलापुंविवेको वा येन कलोर्ध्वे तिष्ठति

Transliteration (IAST)

māyāgarbhādhikāriṇas tu kasyacid īśvarasya prasādāt sarvakarmakṣaye māyāpuruṣaviveko bhavati yena māyordhve vijñānākala āste na jātucit māyādhaḥ kalāpuṃviveko vā yena kalordhve tiṣṭhati

— माया-गर्भ के अधिकारी (अधिष्ठाता) का ; — प्रसाद से, अनुग्रह से ; — समस्त कर्म के क्षय होने पर ; — माया-पुरुष का विवेक (पृथक्करण) ; — विज्ञानाकल (ज्ञान से केवलीभूत जीव) ; — माया के नीचे ; — कला-पुरुष का विवेक

किन्तु माया-गर्भ के किसी अधिकारी ईश्वर के प्रसाद से, समस्त कर्म के क्षय होने पर, किसी अणु में माया-पुरुष का विवेक होता है, जिससे वह माया के ऊपर विज्ञानाकल रूप में स्थित रहता है और कभी (नीचे) नहीं (लौटता); अथवा माया के नीचे कला-पुरुष का विवेक (होता है), जिससे वह कला के ऊपर स्थित रहता है।