The Essence of the Tantra· 8.22 / 93

The Essence of the Tantra8.22

8.22

सो ऽयं मलः परमेश्वरस्य स्वात्मप्रच्छादनेच्छातः नान्यत् किञ्चित् वस्त्व् अपि च तत्परमेश्वरेच्छात्मनैव धरादेर् अपि वस्तुत्वात्

Transliteration (IAST)

so 'yaṃ malaḥ parameśvarasya svātmapracchādanecchātaḥ nānyat kiñcit vastv api ca tatparameśvarecchātmanaiva dharāder api vastutvāt

— मल — अशुद्धि ; — स्व-आत्म-प्रच्छादन की इच्छा से (अपने को ढकने की इच्छा से) ; — वस्तु — (पृथक्) वास्तविक पदार्थ ; — परमेश्वर-इच्छा-रूप से ; — धरा आदि के ; — वस्तुत्व (वास्तविकता) के कारण

यह मल परमेश्वर की स्व-आत्म-प्रच्छादन (अपने को ढकने) की इच्छा से (उत्पन्न) है, अन्य कुछ नहीं; फिर भी वह वस्तु है, क्योंकि वह परमेश्वर-इच्छा-रूप से ही (वस्तु है) — क्योंकि धरा आदि भी उसी रूप से वस्तु हैं।