संविद्रूढस्य प्राणबुद्धिदेहनिष्ठीकरणरूपो हि अभ्यासः भारोद्वहनशास्त्रार्थबोधनृत्ताभ्यासवत् संविद्रूपे तु न किञ्चित् आदातव्यं न अपसरणीयम् इति कथम् अभ्यासः
Transliteration (IAST)
saṃvidrūḍhasya prāṇabuddhidehaniṣṭhīkaraṇarūpo hi abhyāsaḥ bhārodvahanaśāstrārthabodhanṛttābhyāsavat saṃvidrūpe tu na kiñcit ādātavyaṃ na apasaraṇīyam iti katham abhyāsaḥ
क्योंकि संवित् में आरूढ़ के लिए अभ्यास प्राण, बुद्धि एवं देह में किसी वस्तु को स्थापित करने रूप होता है — जैसे भार-वहन, शास्त्रार्थ-बोध अथवा नृत्य का अभ्यास; किन्तु संवित्-रूप में न कुछ ग्रहण करने योग्य है, न दूर करने योग्य — तो अभ्यास कैसा?