The Essence of the Tantra· 4.17 / 46

The Essence of the Tantra4.17

4.17

किं तर्केणापि इति चेत् उक्तम् अत्र द्वैताधिवासनिरासप्रकार एव अयं न तु अन्यत् किञ्चिद् इति

Transliteration (IAST)

kiṃ tarkeṇāpi iti cet uktam atra dvaitādhivāsanirāsaprakāra eva ayaṃ na tu anyat kiñcid iti

— तर्क से भी क्या (लाभ)? ; — यदि ऐसा (आक्षेप किया जाये) ; — द्वैत के अधिवास को दूर करने का प्रकार ; — किन्तु अन्य कुछ नहीं

(शंका) तो फिर तर्क से भी क्या? यदि ऐसा पूछा जाये तो (उत्तर) कहा जा चुका — यह केवल द्वैत के अधिवास (संस्कार) को दूर करने का प्रकार ही है, अन्य कुछ नहीं।