The Essence of the Tantra· 4.18 / 46

The Essence of the Tantra4.18

4.18

लौकिके ऽपि वा अभ्यासे चिदात्मत्वेन सर्वरूपस्य तस्य तस्य देहादेः अभिमतरूपताप्रकटीकरणं तदितररूपन्यग्भावनं च इति एष एव अभ्यासार्थः

Transliteration (IAST)

laukike 'pi vā abhyāse cidātmatvena sarvarūpasya tasya tasya dehādeḥ abhimatarūpatāprakaṭīkaraṇaṃ taditararūpanyagbhāvanaṃ ca iti eṣa eva abhyāsārthaḥ

— लौकिक अभ्यास में भी ; — चित्-आत्मता के कारण ; — सर्व-रूप (जो समस्त रूप वाला है) का ; — अभिमत (इष्ट) रूप का प्रकटीकरण ; — उसके इतर रूपों का न्यग्भावन (दमन) ; — अभ्यास का अर्थ/प्रयोजन

अथवा लौकिक अभ्यास में भी — चित्-आत्मता के कारण सर्व-रूप उस-उस देह आदि के अभिमत (इष्ट) रूप को प्रकट करना तथा उसके इतर रूपों का न्यग्भावन (दमन) करना — अभ्यास का यही अर्थ है।