The Essence of the Tantra· 22.9 / 53

The Essence of the Tantra22.9

22.9

तत्र स्नानादिकर्तव्यानपेक्षयैव पूर्णानन्दविश्रान्त्यैव लब्धशुद्धिः प्रथमं प्राणसंविद्देहैकीभावं भावयित्वा संविदश् च परमशिवरूपत्वात् सप्तविंशतिवारं मन्त्रम् उच्चार्य मूर्धवक्त्रहृद्गुह्यमूर्तिषु अनुलोमविलोमाभ्यां विश्वाध्वपरिपूर्णता परमेश्वरे अपरत्वे परापरत्वे परत्वे ऽपि च

Transliteration (IAST)

tatra snānādikartavyānapekṣayaiva pūrṇānandaviśrāntyaiva labdhaśuddhiḥ prathamaṃ prāṇasaṃviddehaikībhāvaṃ bhāvayitvā saṃvidaś ca paramaśivarūpatvāt saptaviṃśativāraṃ mantram uccārya mūrdhavaktrahṛdguhyamūrtiṣu anulomavilomābhyāṃ viśvādhvaparipūrṇatā parameśvare aparatve parāparatve paratve 'pi ca

— स्नान आदि कर्तव्यों की अपेक्षा के बिना ; — पूर्ण आनन्द में विश्रान्ति से ; — प्राप्त-शुद्धि (वाला) ; — प्राण, संवित् एवं देह का एकीभाव ; — भावित करके ; — संवित् के परम शिव रूप होने के कारण ; — सत्ताईस बार मन्त्र का उच्चारण करके ; — मूर्ध, वक्त्र, हृदय एवं गुह्य रूप मूर्तियों (स्थानों) में ; — अनुलोम एवं विलोम (क्रम) से ; — विश्व-अध्व की परिपूर्णता ; — अपरत्व, परापरत्व एवं परत्व में परमेश्वर में

वहाँ स्नान आदि कर्तव्यों की अपेक्षा के बिना ही, पूर्ण आनन्द में विश्रान्ति से ही प्राप्त-शुद्धि (वाला साधक), सर्वप्रथम प्राण, संवित् एवं देह के एकीभाव को भावित करके, तथा संवित् के परम शिव रूप होने के कारण, सत्ताईस बार मन्त्र का उच्चारण करके, मूर्ध, वक्त्र, हृदय एवं गुह्य रूप मूर्तियों (स्थानों) में अनुलोम एवं विलोम (क्रम) से विश्व-अध्व की परिपूर्णता (का भावन करे) — अपरत्व, परापरत्व एवं परत्व में भी परमेश्वर में।