The Essence of the Tantra· 22.31 / 53

The Essence of the Tantra22.31

22.31

शून्यं निरानन्दमयं निर्वृतिनिजधामतो ऽर्घं च । रणरणकरसान् निजरसभरितबहिर्भावचर्वणरसेन

Transliteration (IAST)

śūnyaṃ nirānandamayaṃ nirvṛtinijadhāmato 'rghaṃ ca | raṇaraṇakarasān nijarasabharitabahirbhāvacarvaṇarasena

— शून्य एवं निरानन्दमय ; — निर्वृति (मात्र-समाप्ति) के निज धाम से ; — और अर्घ (पूज्य/सार) ; — रणरणक (व्याकुल उत्कण्ठा) के रस से ; — अपने रस से भरे बाह्य-भाव के चर्वण (आस्वादन) के रस से

(निर्वृति का धाम) शून्य एवं निरानन्दमय है; निर्वृति (मात्र-समाप्ति) के निज धाम से (यह) अर्घ (पूज्य/सार है) — रणरणक (व्याकुल उत्कण्ठा) के रस से, अपने रस से भरे बाह्य-भाव के चर्वण (आस्वादन) के रस के द्वारा।