The Essence of the Tantra· 22.32 / 53

The Essence of the Tantra22.32

22.32

आन्तरपूर्णसमुच्छलदनुचक्रं याति चक्रम् अथ तद् अपि । उच्छलति प्राग्वद् इति त्रिविधो ऽन्वर्थो विसर्गो ऽयम्

Transliteration (IAST)

āntarapūrṇasamucchaladanucakraṃ yāti cakram atha tad api | ucchalati prāgvad iti trividho 'nvartho visargo 'yam

— आन्तर रूप से पूर्ण होकर उच्छलित होता हुआ ; — अनुचक्र में जाता है ; — फिर वह (अनुचक्र) भी ; — पूर्ववत् उच्छलित होता है ; — यह विसर्ग त्रिविध एवं अन्वर्थ (नाम के अनुरूप)

आन्तर रूप से पूर्ण होकर उच्छलित होता हुआ (वह) अनुचक्र में जाता है, फिर वह (अनुचक्र) भी पूर्ववत् उच्छलित होता है — इस प्रकार यह विसर्ग त्रिविध एवं अन्वर्थ (नाम के अनुरूप) है।