The Essence of the Tantra· 22.27 / 53

The Essence of the Tantra22.27

22.27

स्वात्मान्योन्यावेशात् शान्तान्यत्वे द्वयोर् द्वयात्मत्वात् । शक्तिस् तु तद्वद् उदितां सृष्टिं पुष्णाति नो तद्वान्

Transliteration (IAST)

svātmānyonyāveśāt śāntānyatve dvayor dvayātmatvāt | śaktis tu tadvad uditāṃ sṛṣṭiṃ puṣṇāti no tadvān

— अपने स्वरूप के परस्पर आवेश से ; — शान्त एवं अन्य (उदित) में ; — दोनों के द्वय-आत्मक होने के कारण ; — किन्तु शक्ति ; — वैसे ही उदित सृष्टि को पुष्ट करती है ; — शक्तिमान् (वीर) नहीं

अपने स्वरूप के परस्पर आवेश से, शान्त एवं अन्य (उदित) में, दोनों के द्वय-आत्मक होने के कारण (युगपत् उदय होता है)। किन्तु शक्ति वैसे ही उदित सृष्टि को पुष्ट करती है, शक्तिमान् (वीर) नहीं।