The Essence of the Tantra· 22.26 / 53

The Essence of the Tantra22.26

22.26

अनवच्छिन्नपदेप्सुस् तां संविदम् आत्मसात्कुर्यात् । शान्तोदितात्मकद्वयम् अथ युगपद् उदेति शक्तिशक्तिमतोः

Transliteration (IAST)

anavacchinnapadepsus tāṃ saṃvidam ātmasātkuryāt | śāntoditātmakadvayam atha yugapad udeti śaktiśaktimatoḥ

— अनवच्छिन्न (अखण्ड) पद का अभिलाषी ; — उस संवित् को आत्मसात् करे ; — शान्त एवं उदित आत्मक द्वय (युगल) ; — युगपत् (एक साथ) उदित होता है ; — शक्ति एवं शक्तिमान् का

अनवच्छिन्न (अखण्ड) पद का अभिलाषी उस संवित् को आत्मसात् करे। तब शान्त एवं उदित आत्मक द्वय (युगल), शक्ति एवं शक्तिमान् का, युगपत् (एक साथ) उदित होता है।