The Essence of the Tantra· 22.28 / 53

The Essence of the Tantra22.28

22.28

तस्यां चार्यं कुलम् अथ तया नृषु प्रोक्तयोगसङ्घट्टान् । अथ सृष्टे द्वितये ऽस्मिन् शान्तोदितधाम्नि ये ऽनुसन्दधते

Transliteration (IAST)

tasyāṃ cāryaṃ kulam atha tayā nṛṣu proktayogasaṅghaṭṭān | atha sṛṣṭe dvitaye 'smin śāntoditadhāmni ye 'nusandadhate

— और उस (शक्ति) में आर्य कुल ; — उसके द्वारा मनुष्यों में प्रोक्त योग-सङ्घट्ट ; — इस सृष्ट द्वय में ; — शान्त एवं उदित के धाम में ; — जो (साधक) अनुसन्धान करते हैं

और उस (शक्ति) में आर्य कुल (है); तथा उसके द्वारा मनुष्यों में प्रोक्त योग-सङ्घट्टों (का सम्पादन होता है)। अब इस सृष्ट द्वय (शान्त-उदित) में, शान्त एवं उदित के धाम में, जो (साधक) अनुसन्धान करते हैं —