The Essence of the Tantra· 22.29 / 53

The Essence of the Tantra22.29

22.29

प्राच्यां विसर्गसत्ताम् अनवच्छिदिते पदे रूढाः । उदितं च मिथो वक्त्रान् मुख्याद् वक्त्रे प्रगृह्यते च बहिः

Transliteration (IAST)

prācyāṃ visargasattām anavacchidite pade rūḍhāḥ | uditaṃ ca mitho vaktrān mukhyād vaktre pragṛhyate ca bahiḥ

— पूर्व (शान्त) में विसर्ग-सत्ता को ; — अनवच्छिन्न पद में रूढ़ ; — और उदित (विसर्ग) परस्पर ; — मुख्य वक्त्र (गुरु-मुख) से ; — (शिष्य के) वक्त्र में गृहीत होता है ; — बाहर भी

वे पूर्व (शान्त) में विसर्ग-सत्ता को (अनुसन्धान करते हुए) अनवच्छिन्न पद में रूढ़ हो जाते हैं; और उदित (विसर्ग) परस्पर, मुख्य वक्त्र (गुरु-मुख) से, (शिष्य के) वक्त्र में गृहीत होता है, तथा बाहर भी।