The Essence of the Tantra· 16.6 / 24

The Essence of the Tantra16.6

16.6

ततो देवं पूजयित्वा तदाकृतिं कुशादिमयीम् अग्रे स्थापयित्वा गुर्वासादितज्ञानोपदेशक्रमेण तां पश्येत् स च मूलाधाराद् उदेत्य प्रसृतसुविततानन्तनाड्यध्वदण्डं वीर्येणाक्रम्य नासागगनपरिगतं विक्षिपन् व्याप्तुम् ईष्टे

Transliteration (IAST)

tato devaṃ pūjayitvā tadākṛtiṃ kuśādimayīm agre sthāpayitvā gurvāsāditajñānopadeśakrameṇa tāṃ paśyet sa ca mūlādhārād udetya prasṛtasuvitatānantanāḍyadhvadaṇḍaṃ vīryeṇākramya nāsāgaganaparigataṃ vikṣipan vyāptum īṣṭe

— देव की पूजा कर ; — उस (मृत जीव) की आकृति ; — कुश आदि से बनी ; — आगे स्थापित कर ; — गुरु से प्राप्त ज्ञान-उपदेश के क्रम से ; — देखे, चिन्तन करे ; — मूलाधार से उदित होकर ; — प्रसृत, सुवितत, अनन्त नाड़ी-अध्वा रूप दण्ड ; — वीर्य (सामर्थ्य) से आक्रान्त कर ; — नासा-गगन (नासिका के व्योम) को प्राप्त ; — विक्षेप करता हुआ (प्रक्षेपित करता हुआ) ; — व्याप्त होने में समर्थ

फिर देव की पूजा कर, उस (जीव) की कुश आदि से बनी आकृति को आगे स्थापित कर, गुरु से प्राप्त ज्ञान-उपदेश के क्रम से उसे देखे। और वह (प्राण-शक्ति) मूलाधार से उदित होकर, प्रसृत, सुविततं, अनन्त नाड़ी-अध्वा रूप दण्ड को वीर्य से आक्रान्त कर, नासा-गगन को प्राप्त, विक्षेप करता हुआ व्याप्त होने में समर्थ होता है।