The Essence of the Tantra· 16.7 / 24

The Essence of the Tantra16.7

16.7

यावद् धूमाभिरामप्रचिततरशिखाजालकेनाध्वचक्रं सञ्छाद्याभीष्टजीवानयनम् इति महाञ् जालनामा प्रयोगः

Transliteration (IAST)

yāvad dhūmābhirāmapracitataraśikhājālakenādhvacakraṃ sañchādyābhīṣṭajīvānayanam iti mahāñ jālanāmā prayogaḥ

— धूम से अभिराम (मनोहर) अति-सघन शिखा-जालक से ; — अध्व-चक्र (कोस्मिक मार्ग का चक्र) ; — आच्छादित कर ; — अभीष्ट जीव का आनयन (लाना) ; — महान् (प्रयोग) ; — जाल नामक ; — प्रयोग — अनुष्ठान-प्रक्रिया

जब तक धूम से अभिराम (मनोहर), अति-प्रचित (सघन) शिखा-जालक से अध्व-चक्र को आच्छादित कर अभीष्ट जीव का आनयन (होता है) — यह 'जाल' नामक महान् प्रयोग है।