Stanzas on the Divine Pulsation · 1.4

Stanzas on the Divine Pulsation 1.4

1.4
अहं सुखी च दुःखी च रक्तश्चेत्यादिसंविदः । सुखाद्यवस्थानुस्यूते वर्तन्तेऽन्यत्र ताः स्फुटम् ॥४॥
ahaṃ sukhī ca duḥkhī ca raktaś cetyādi-saṃvidaḥ | sukhādy-avasthānusyūte vartante 'nyatra tāḥ sphuṭam ||
anuṣṭubh
— 'मैं सुखी हूँ' (पदबन्ध) ; — और (अव्यय) ; — दुःखी, क्लेशयुक्त (कर्ता कारक एकवचन) ; — और (अव्यय) ; — रक्त, राग-युक्त, आसक्त (कर्ता कारक एकवचन) ; — इत्यादि (ऐसी 'मैं हूँ' आदि प्रतीतियाँ) — अव्यय समास ; — संवित् (बोध-प्रतीतियाँ) — कर्ता कारक बहुवचन ; — सुख आदि अवस्थाओं में अनुस्यूत (पिरोए हुए) में (अधिकरण कारक — समासगत) ; — रहती हैं, विद्यमान हैं (वर्तमान, तृ.पु.बहु., आत्मनेपद √वृत्) ; — अन्यत्र, किसी दूसरे (आधार) में (अव्यय) ; — वे (संवित्तियाँ) — स्त्री.कर्ता बहु. सर्वनाम ; — स्पष्ट रूप से, प्रकट रूप से (अव्यय)

'मैं सुखी हूँ', 'मैं दुःखी हूँ', 'मैं रागयुक्त हूँ' इत्यादि जो संवित् (बोध) हैं, वे स्पष्ट ही सुख आदि अवस्थाओं में अनुस्यूत (पिरोई हुई) किसी अन्य (स्पन्द-तत्त्व) में स्थित हैं।