न दुःखं न सुखं यत्र न ग्राह्यं ग्राहकं न च ।
न चास्ति मूढभावोऽपि तदस्ति परमार्थतः ॥५॥
na duḥkhaṃ na sukhaṃ yatra na grāhyaṃ grāhakaṃ na ca |
na cāsti mūḍha-bhāvo 'pi tad asti paramārthataḥ ||
anuṣṭubh
— नहीं (अव्यय, निषेधार्थक); — दुःख, कष्ट (कर्ता कारक, नपुंसक एकवचन); — नहीं (अव्यय, निषेधार्थक); — सुख, आनन्द (कर्ता कारक, नपुंसक एकवचन); — जहाँ, जिस (अवस्था) में (सम्बन्धवाचक अव्यय); — नहीं (अव्यय, निषेधार्थक); — ग्राह्य — ज्ञान का विषय (कर्ता कारक); — ग्राहक — विषयी, जानने वाला (कर्ता कारक); — और न ही (निषेध सहित); — न ही है (निषेध + वर्तमान तृ.पु.एक.); — मूढ़भाव — जड़ता, चेतना-शून्यता की अवस्था (कर्ता कारक); — भी (अव्यय); — वह (स्पन्द तत्त्व) — नपुं.कर्ता एक.; — है, विद्यमान है (वर्त. तृ.पु.एक. √अस्); — परमार्थतः, परम सत्य की दृष्टि से (अव्यय)
जहाँ न दुःख है, न सुख, न ग्राह्य (विषय), न ग्राहक (विषयी), और न मूढ़भाव (जड़ता) ही है — परमार्थतः वही (तत्त्व) है।