Stanzas on the Divine Pulsation · 1.3

Stanzas on the Divine Pulsation 1.3

1.3
जाग्रदादिविभेदेऽपि तदभिन्ने प्रसर्पति । निवर्तते निजान्नैव स्वभावादुपलब्धृतः ॥३॥
jāgrad-ādi-vibhede 'pi tad-abhinne prasarpati | nivartate nijān naiva svabhāvād upalabdhṛtaḥ ||
anuṣṭubh
— जाग्रत् आदि (अवस्थाओं के) भेद में (अधिकरण कारक — समासगत) ; — भी (अव्यय) ; — उससे (अर्थात् स्व-स्वरूप से) अभिन्न (अधिकरण कारक — समासगत) ; — फैलता है, प्रसरित होता है (वर्तमान काल) ; — नहीं हटता, विरत नहीं होता (वर्तमान काल) ; — अपने (स्वरूप) से — पु.पञ्चमी एक. ; — कदापि नहीं (निषेध + निश्चयार्थक) ; — अपने स्वभाव से (अपादान कारक) ; — उपलब्धा (अनुभोक्ता / प्रत्यक्षकर्ता) के रूप से (अपादान कारक)

जाग्रत् आदि (अवस्थाओं के) भेद में फैलते हुए भी वह उनसे अभिन्न रहता है; अपने स्वभाव से — उपलब्धा (अनुभवकर्ता-रूप) से — वह कभी नहीं हटता।