Stanzas on the Divine Pulsation · 1.2

Stanzas on the Divine Pulsation 1.2

1.2
यत्र स्थितमिदं सर्वं कार्यं यस्माच्च निर्गतम् । तस्यानावृतरूपत्वान्न निरोधोऽस्ति कुत्रचित् ॥२॥
yatra sthitam idaṃ sarvaṃ kāryaṃ yasmāc ca nirgatam | tasyānāvṛta-rūpatvān na nirodho 'sti kutracit ||
anuṣṭubh
— जहाँ, जिसमें (अधिकरण-सूचक सम्बन्धवाचक) ; — स्थित है, प्रतिष्ठित है (कर्मवाच्य भूत कृदन्त) ; — यह सम्पूर्ण, यह सब (कर्ता कारक, नपुंसक एकवचन) ; — कार्य, करणीय, उत्पन्न हुआ कार्य-रूप जगत (कर्ता कारक) ; — जिससे (अपादान-सूचक सम्बन्धवाचक) ; — और निःसृत हुआ है (बाहर निकला है) ; — उसका (षष्ठी एकवचन) ; — अनावृत (अनाच्छादित) स्वरूप होने के कारण (अपादान — समासगत) ; — कोई निरोध (अवरोध) नहीं है ; — कहीं भी (अनिश्चयवाचक अव्यय)

जिसमें यह सम्पूर्ण कार्यरूप (विश्व) स्थित है और जिससे यह सब निःसृत हुआ है — उसके अनावृत (अनाच्छादित) स्वरूप के कारण कहीं भी कोई निरोध (अवरोध) नहीं है।