yatra sthitam idaṃ sarvaṃ kāryaṃ yasmāc ca nirgatam |
tasyānāvṛta-rūpatvān na nirodho 'sti kutracit ||
anuṣṭubh
— जहाँ, जिसमें (अधिकरण-सूचक सम्बन्धवाचक); — स्थित है, प्रतिष्ठित है (कर्मवाच्य भूत कृदन्त); — यह सम्पूर्ण, यह सब (कर्ता कारक, नपुंसक एकवचन); — कार्य, करणीय, उत्पन्न हुआ कार्य-रूप जगत (कर्ता कारक); — जिससे (अपादान-सूचक सम्बन्धवाचक); — और निःसृत हुआ है (बाहर निकला है); — उसका (षष्ठी एकवचन); — अनावृत (अनाच्छादित) स्वरूप होने के कारण (अपादान — समासगत); — कोई निरोध (अवरोध) नहीं है; — कहीं भी (अनिश्चयवाचक अव्यय)
जिसमें यह सम्पूर्ण कार्यरूप (विश्व) स्थित है और जिससे यह सब निःसृत हुआ है — उसके अनावृत (अनाच्छादित) स्वरूप के कारण कहीं भी कोई निरोध (अवरोध) नहीं है।