अतस्तत्कृत्रिमं ज्ञेयं सौषुप्तपदवत्सदा ।
न त्वेवं स्मर्यमाणत्वं तत्तत्त्वं प्रतिपद्यते ॥१३॥
atas tat-kṛtrimaṃ jñeyaṃ sauṣupta-padavat sadā |
na tv evaṃ smaryamāṇatvaṃ tat-tattvaṃ pratipadyate ||
anuṣṭubh
— इसलिए, अतः (अव्यय); — वह (शून्यावस्था) — नपुं.कर्ता एक.; — कृत्रिम, कल्पित, बनावटी (विशेषण); — ज्ञेय — जानने योग्य (विधि-कृदन्त, कर्ता कारक); — सुषुप्ति (सौषुप्त) पद के समान (अव्यय); — सदा, हमेशा (अव्यय); — किन्तु नहीं (व्याघातार्थक); — इस प्रकार, ऐसे (अव्यय); — स्मर्यमाणता — स्मरण का विषय होना (कर्ता कारक); — वह तत्त्व, वह परम वास्तविकता (कर्ता कारक — समासगत); — प्राप्त किया जाता है, अनुभूत होता है (वर्त. तृ.पु.एक., आ.प. √प्रति-पद्)
अतः वह (अभावरूप शून्य) सदा सौषुप्त-पद के समान कृत्रिम (बनावटी) ही समझना चाहिए; तत्त्व इस प्रकार स्मरण के विषय-रूप में प्रकट नहीं होता।