Stanzas on the Divine Pulsation · 1.12

Stanzas on the Divine Pulsation 1.12

1.12
नाभावो भाव्यतामेति न च तत्रास्त्यमूढता । यतोऽभियोगसंस्पर्शात्तदासीदिति निश्चयः ॥१२॥
nābhāvo bhāvyatām eti na ca tatrāsty amūḍhatā | yato 'bhiyoga-saṃsparśāt tadāsīd iti niścayaḥ ||
anuṣṭubh
— नहीं (अव्यय, निषेधार्थक) ; — अभाव — असत्ता, शून्य (कर्ता कारक) ; — ध्येयता — ध्यान का विषय होने की स्थिति (कर्म कारक, स्त्रीलिङ्ग) ; — पहुँचता है, प्राप्त करता है (वर्त. तृ.पु.एक. √इ) ; — और न ही (निषेध सहित) ; — वहाँ, उस में (अव्यय) ; — है, विद्यमान है (वर्त. तृ.पु.एक. √अस्) ; — अमूढ़ता — चैतन्यपूर्ण बोध (कर्ता कारक, स्त्रीलिङ्ग) ; — क्योंकि, जिससे (हेत्वर्थक सम्बन्धवाचक अव्यय) ; — अभियोग (पश्चात्वर्ती चिन्तन) के संस्पर्श से (अपादान कारक — समासगत) ; — तब (कालवाचक नित्यसम्बन्धी अव्यय) ; — था, विद्यमान था (अनद्यतन भूत, तृ.पु.एक. √अस्) ; — इस प्रकार, ऐसा (उद्धरण-समापक अव्यय) ; — निश्चय, दृढ़ संकल्प, निर्धारण (कर्ता कारक)

अभाव (शून्य) ध्येय (ध्यान का विषय) नहीं बन सकता, न ही उसमें अमूढ़ता (बोध) होती है; फिर भी अभियोग (पश्चात्-विचार) के संस्पर्श से 'वह (अभाव) था' — ऐसा निश्चय होता है।