Stanzas on the Divine Pulsation · 1.11

Stanzas on the Divine Pulsation 1.11

1.11
तमधिष्ठातृभावेन स्वभावमवलोकयन् । स्मयमान इवास्ते यस्तस्येयं कुसृतिः कुतः ॥११॥
tam adhiṣṭhātṛ-bhāvena svabhāvam avalokayan | smayamāna ivāste yas tasyeyaṃ kusṛtiḥ kutaḥ ||
anuṣṭubh
— उस को (शङ्कर, आत्मा) — पु.कर्म एक. ; — अधिष्ठातृ (शासक, अधिष्ठाता) भाव से (करण कारक — समासगत) ; — स्वभाव को, अपने वास्तविक स्वरूप को (कर्म कारक) ; — अवलोकन करते हुए, देखते हुए (वर्तमान कृदन्त, कर्ता कारक) ; — विस्मित होता हुआ, चकित-सा (वर्तमान कृदन्त, कर्ता कारक) ; — मानो, जैसे (तुलनार्थक अव्यय) ; — रहता है, अवस्थित होता है (वर्त. तृ.पु.एक., आत्मनेपद √आस्) ; — जो — पु.कर्ता एक. सम्बन्धवाचक सर्वनाम ; — उसका — पु.षष्ठी एक. सर्वनाम ; — यह — स्त्री.कर्ता एक. ; — कुसृति — दुष्ट संसार-मार्ग, बुरा भ्रमण (कर्ता कारक, स्त्रीलिङ्ग) ; — कहाँ से? (अर्थात् कहीं से नहीं) — प्रश्नवाचक अव्यय

जो अपने स्वभाव को अधिष्ठातृ (शासक) रूप से देखते हुए विस्मित-सा रहता है — उसके लिए यह कुसृति (दुष्ट संसार-मार्ग) कहाँ से आ सकती है?