तदास्याकृत्रिमो धर्मो ज्ञत्वकर्तृत्वलक्षणः ।
यतस्तदेप्सितं सर्वं जानाति च करोति च ॥१०॥
tadāsyākṛtrimo dharmo jñatva-kartṛtva-lakṣaṇaḥ |
yatas tad epsitaṃ sarvaṃ jānāti ca karoti ca ||
anuṣṭubh
— तब (कालवाचक नित्यसम्बन्धी अव्यय); — उस (साधक) का — पु.षष्ठी एक.; — अकृत्रिम, सहज, स्वाभाविक (विशेषण); — धर्म, स्वभाव, गुण (कर्ता कारक); — ज्ञत्व (सर्वज्ञता) और कर्तृत्व (सर्वकर्तृत्व) से लक्षित (समासगत कर्ता कारक); — क्योंकि, जिससे (हेत्वर्थक सम्बन्धवाचक अव्यय); — उस को — नपुं.कर्म एक.; — इच्छित, अभीष्ट (भूत कृदन्त, कर्म कारक); — सब कुछ — नपुं.कर्म/कर्ता एक.; — जानता है (वर्तमान काल); — और (अव्यय); — करता है (वर्तमान काल); — और (अव्यय)
तब उसका अकृत्रिम (सहज) धर्म, जो ज्ञत्व (सर्वज्ञता) और कर्तृत्व (सर्वकर्तृत्व) से लक्षित है, प्रकट हो जाता है; जिससे वह जो कुछ चाहे, उसे जानता और करता है।