Stanzas on the Divine Pulsation · 1.10

Stanzas on the Divine Pulsation 1.10

1.10
तदास्याकृत्रिमो धर्मो ज्ञत्वकर्तृत्वलक्षणः । यतस्तदेप्सितं सर्वं जानाति च करोति च ॥१०॥
tadāsyākṛtrimo dharmo jñatva-kartṛtva-lakṣaṇaḥ | yatas tad epsitaṃ sarvaṃ jānāti ca karoti ca ||
anuṣṭubh
— तब (कालवाचक नित्यसम्बन्धी अव्यय) ; — उस (साधक) का — पु.षष्ठी एक. ; — अकृत्रिम, सहज, स्वाभाविक (विशेषण) ; — धर्म, स्वभाव, गुण (कर्ता कारक) ; — ज्ञत्व (सर्वज्ञता) और कर्तृत्व (सर्वकर्तृत्व) से लक्षित (समासगत कर्ता कारक) ; — क्योंकि, जिससे (हेत्वर्थक सम्बन्धवाचक अव्यय) ; — उस को — नपुं.कर्म एक. ; — इच्छित, अभीष्ट (भूत कृदन्त, कर्म कारक) ; — सब कुछ — नपुं.कर्म/कर्ता एक. ; — जानता है (वर्तमान काल) ; — और (अव्यय) ; — करता है (वर्तमान काल) ; — और (अव्यय)

तब उसका अकृत्रिम (सहज) धर्म, जो ज्ञत्व (सर्वज्ञता) और कर्तृत्व (सर्वकर्तृत्व) से लक्षित है, प्रकट हो जाता है; जिससे वह जो कुछ चाहे, उसे जानता और करता है।