व्याप्तं किञ्चिद्रिपोर्देहं मदीयं संहराम्यहम् ।
जडरूपो भवामीति चिन्तया मरणं स्थितम् ॥७४॥
vyāptaṃ kiñcidripordehaṃ madīyaṃ saṃharāmyaham |
jaḍarūpo bhavāmīti cintayā maraṇaṃ sthitam
'(मुझसे) व्याप्त, अतः मेरे, शत्रु के शरीर के किसी (अंश) का मैं संहार करता हूँ — (और उसमें) जड़रूप हो जाता हूँ' — इस चिन्तन के द्वारा (उसका) मरण सिद्ध हो जाता है (— यह मारण-कर्म है)।