The Vision of Śiva· 7.74 / 122

The Vision of Śiva7.74

7.74
व्याप्तं किञ्चिद्रिपोर्देहं मदीयं संहराम्यहम् । जडरूपो भवामीति चिन्तया मरणं स्थितम् ॥७४॥
vyāptaṃ kiñcidripordehaṃ madīyaṃ saṃharāmyaham | jaḍarūpo bhavāmīti cintayā maraṇaṃ sthitam
— व्याप्त ; — किसी (अंश) ; — शत्रु के शरीर के ; — मेरे ; — 'मैं संहार करता हूँ' ; — 'मैं जड़रूप हो जाता हूँ' ; — इस चिन्तन से ; — मरण ; — सिद्ध हो जाता है

'(मुझसे) व्याप्त, अतः मेरे, शत्रु के शरीर के किसी (अंश) का मैं संहार करता हूँ — (और उसमें) जड़रूप हो जाता हूँ' — इस चिन्तन के द्वारा (उसका) मरण सिद्ध हो जाता है (— यह मारण-कर्म है)।