The Vision of Śiva· 7.75 / 122

The Vision of Śiva7.75

7.75
व्याप्तिदार्ढ्ये नक्तमेकं चन्द्रं वात्मानमुत्थितम् । विचिन्त्य प्रस्रवन्तं के कस्याप्याप्यायनं भवेत् ॥७५॥
vyāptidārḍhye naktamekaṃ candraṃ vātmānamutthitam | vicintya prasravantaṃ ke kasyāpyāpyāyanaṃ bhavet
— व्याप्ति की दृढ़ता होने पर ; — रात्रि में ; — एक चन्द्र के रूप में ; — अथवा अपने को ; — उदित ; — चिन्तन करके ; — (अमृत) प्रस्रवित (झरता हुआ) ; — मस्तक पर ; — किसी के ; — आप्यायन (पोषण) ; — हो जाएगा

व्याप्ति की दृढ़ता होने पर, रात्रि में अपने को एक उदित चन्द्र के रूप में, किसी के मस्तक पर (अमृत) प्रस्रवित (झरता हुआ) चिन्तन करके, उस (व्यक्ति) का आप्यायन (पोषण एवं कल्याण) हो जाएगा (— यह आप्यायन-कर्म है)।