The Vision of Śiva· 7.76 / 122

The Vision of Śiva7.76

7.76
चित्तत्त्वं चिन्तयन् रूपं व्यापकं वाखिलात्मसु । अविनाश्येकपिण्डे वा स भवेदजरामरः ॥७६॥
cittattvaṃ cintayan rūpaṃ vyāpakaṃ vākhilātmasu | avināśyekapiṇḍe vā sa bhavedajarāmaraḥ
— चित्तत्त्व (चैतन्य-तत्त्व) का ; — चिन्तन करते हुए ; — रूप को ; — व्यापक ; — अथवा ; — समस्त आत्माओं में ; — अथवा अविनाशी एक पिण्ड के रूप में ; — वह ; — हो जाएगा ; — अजर-अमर

चित्तत्त्व (चैतन्य-तत्त्व) का चिन्तन करते हुए — (उसके) रूप को समस्त आत्माओं में व्यापक रूप में, अथवा अविनाशी एक पिण्ड के रूप में — वह (साधक) अजर-अमर (जरा एवं मृत्यु से रहित) हो जाएगा।