चित्तत्त्वं चिन्तयन् रूपं व्यापकं वाखिलात्मसु ।
अविनाश्येकपिण्डे वा स भवेदजरामरः ॥७६॥
cittattvaṃ cintayan rūpaṃ vyāpakaṃ vākhilātmasu |
avināśyekapiṇḍe vā sa bhavedajarāmaraḥ
चित्तत्त्व (चैतन्य-तत्त्व) का चिन्तन करते हुए — (उसके) रूप को समस्त आत्माओं में व्यापक रूप में, अथवा अविनाशी एक पिण्ड के रूप में — वह (साधक) अजर-अमर (जरा एवं मृत्यु से रहित) हो जाएगा।