The Vision of Śiva· 7.77 / 122

The Vision of Śiva7.77

7.77
स्रवत्कृष्णामृतं मेघमात्मोपरि निजात्मकम् । ध्यायतो बालमात्मानं सा जरा संप्रलीयते ॥७७॥
sravatkṛṣṇāmṛtaṃ meghamātmopari nijātmakam | dhyāyato bālamātmānaṃ sā jarā saṃpralīyate
— कृष्ण (श्याम) अमृत झराते हुए ; — मेघ का ; — अपने ऊपर ; — अपने ही स्वरूप वाले ; — ध्यान करते हुए (साधक) की ; — अपने को बाल (शिशु) के रूप में ; — वह जरा ; — संप्रलीन हो जाती है

जो (साधक) अपने ऊपर कृष्ण (श्याम) अमृत झराते हुए, अपने ही स्वरूप वाले मेघ का, तथा अपने को बाल (शिशु) के रूप में ध्यान करता है — उसकी वह जरा (वृद्धावस्था) संप्रलीन (पूर्णतः विलीन) हो जाती है (— यह कायाकल्प-कर्म है)।