स्रवत्कृष्णामृतं मेघमात्मोपरि निजात्मकम् ।
ध्यायतो बालमात्मानं सा जरा संप्रलीयते ॥७७॥
sravatkṛṣṇāmṛtaṃ meghamātmopari nijātmakam |
dhyāyato bālamātmānaṃ sā jarā saṃpralīyate
जो (साधक) अपने ऊपर कृष्ण (श्याम) अमृत झराते हुए, अपने ही स्वरूप वाले मेघ का, तथा अपने को बाल (शिशु) के रूप में ध्यान करता है — उसकी वह जरा (वृद्धावस्था) संप्रलीन (पूर्णतः विलीन) हो जाती है (— यह कायाकल्प-कर्म है)।