The Vision of Śiva· 7.78 / 122

The Vision of Śiva7.78

7.78
ध्यानं नामात्र यत्सर्वं सर्वाकारेण लक्ष्यते । भावनाचक्षुषा साध्वी सा चिन्ता सर्वदर्शिनी ॥७८॥
dhyānaṃ nāmātra yatsarvaṃ sarvākāreṇa lakṣyate | bhāvanācakṣuṣā sādhvī sā cintā sarvadarśinī
— जिसे ध्यान कहा गया है ; — यहाँ ; — जो (इस प्रकार है) जिससे ; — सब कुछ ; — सर्वाकार रूप में ; — लक्षित (देखा) जाता है ; — भावना-चक्षु से ; — उत्कृष्ट ; — वह चिन्ता (चिन्तन) ; — सर्वदर्शिनी

यहाँ जिसे ध्यान कहा गया है वह यही है, जिसके द्वारा सब कुछ सर्वाकार रूप में भावना-चक्षु (भावना के नेत्र) से लक्षित (देखा) जाता है; वह उत्कृष्ट चिन्ता (चिन्तन) सर्वदर्शिनी (सबको देखने वाली) है।